Now I have become a fan of Gopal Das Neeraj... Hats off to his writing...
मैँ पीडा का राजकुँवर हूँ, तुम शहज़ादी रूपनगर की,
हो भी गया प्रेम हम मे तो बोलो , मिलन कहाँ पर होगा ?
मेरा कुर्ता सिला दुखोँ ने,
बदनामी ने काज निकाले
तुमने जो आँचल ओढे
उसमे अम्बर ने खुद जडे सितारे
मै केवल पानी ही पानी,
तुम केवल मदिरा ही मदिरा,
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा ?
मै जन्मा इसलिये कि,
थोडी उम्र आँसुओँ की बढ जाये,
तुम आयी इस हेतु कि मेँहदी,
रोज नये कँगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मै अस्ताचल,
तुम सुखान्त की मै दुखान्त की
मिल भी गये अन्क अपने तो, रस अवतरण कहाँ पर होगा ?
मीलोँ जहाँ ना पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ,
नित होँठ करे गीतोँ का न्यौता,
मेरी उमर अमावस काली
और तुम्हारी पूनम गोरी,
मिल भी गयी राशी अपनी तो, बोलो लगन कहाँ पर होगा ?
इतना दानी नहीँ समय की,
हर गमले मे फूल खिला दे,
इतनी भावुक नही ज़िन्दगी,
हर खत का उत्तर भिजवा दे,
मिलना अपना सरल नहीँ पर,
फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा, जाने भुवन कहाँ पर होगा ?
हो भी गया प्रेम हम मे तो बोलो , मिलन कहाँ पर होगा ?
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