Another good one by- Gopal Das Neeraj
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो!
हैं फूल रोकते, कांटे मुझे चलाते,
मरूस्थल,पहाड़ चलने की चाह बढाते,
सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं,
मेरे पग तब चलने में भी शर्माते,
मेरे संग चलने लगे हवाएं जिससे ,
तुम पाथ के कण -कण को तूफ़ान करो|
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
अंगार अधर पे धर मैं मुसकाया हूँ ,
मैं मरघट से जिन्दगी बुला लाया हूँ ,
हूँ आँख -मिचौनी खेल चुका किस्मत से ,
सौ बार मृत्यु के गले चूम आया हूँ ,
है नहीं मुझे स्वीकार दया अपनी भी ,
तुम मत मुझ पर कोई एहसान करो |
मैं तूफानों में चलने का aadi हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
श्रम के जल से ही राह सदा सिंचती है ,
गति की मशाल आंधी में ही हंसती है ,
शूलों से ही श्रृंगार पथिक का होता ,
मंज़िल की मांग लहू से हो सजती है ,
पग में गति आती है छाले छिलने से ,
तुम पग पग पर जलती चट्टान धरो |
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
फूलों से मग आसान नहीं होता है ,
रुकने से पग गतिवान नहीं होता है ,
अवरोध नहीं तो सम्भव नहीं प्रगति भी ,
है नाश जहाँ निर्माण वहीँ होता है ,
मैं बसा सकूं नव स्वर्ग धरा पर जिससे ,
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो |
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
मैं पंथी तूफानों में राह बनाता,
मेरी दुनिया से केवल इतना नाता -
वो मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर ,
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ़ता जाता ,
मैं ठुकरा सकूं तुम्हे भी हंसकर जिससे ,
तुम मेरा मन -मानस पाषाण करो |
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
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