Saturday, August 25, 2007

मैं तूफानों मे चलने का आदी हूँ

Another good one by- Gopal Das Neeraj

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो!
हैं फूल रोकते, कांटे मुझे चलाते,
मरूस्थल,पहाड़ चलने की चाह बढाते,
सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं,
मेरे पग तब चलने में भी शर्माते,
मेरे संग चलने लगे हवाएं जिससे ,
तुम पाथ के कण -कण को तूफ़ान करो|
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
अंगार अधर पे धर मैं मुसकाया हूँ ,
मैं मरघट से जिन्दगी बुला लाया हूँ ,
हूँ आँख -मिचौनी खेल चुका किस्मत से ,
सौ बार मृत्यु के गले चूम आया हूँ ,
है नहीं मुझे स्वीकार दया अपनी भी ,
तुम मत मुझ पर कोई एहसान करो |
मैं तूफानों में चलने का aadi हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
श्रम के जल से ही राह सदा सिंचती है ,
गति की मशाल आंधी में ही हंसती है ,
शूलों से ही श्रृंगार पथिक का होता ,
मंज़िल की मांग लहू से हो सजती है ,
पग में गति आती है छाले छिलने से ,
तुम पग पग पर जलती चट्टान धरो |
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
फूलों से मग आसान नहीं होता है ,
रुकने से पग गतिवान नहीं होता है ,
अवरोध नहीं तो सम्भव नहीं प्रगति भी ,
है नाश जहाँ निर्माण वहीँ होता है ,
मैं बसा सकूं नव स्वर्ग धरा पर जिससे ,
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो |
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !
मैं पंथी तूफानों में राह बनाता,
मेरी दुनिया से केवल इतना नाता -
वो मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर ,
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ़ता जाता ,
मैं ठुकरा सकूं तुम्हे भी हंसकर जिससे ,
तुम मेरा मन -मानस पाषाण करो |
मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंज़िल आसान करो !

Saturday, January 27, 2007

raah pakar tu ek

madira mein jaane ko ghar se chaltaa hai peenewaala
kis path se jaaoon asmanjas mein hai wo bhola bhaala
alag alag pathu batalaathi sab par main ye bataata hoon
raah pakar tu ek chalaa-chal paa jaayega madhushaala.

Saturday, January 13, 2007

My first real blog

This is the fourth time that I am trying to write this post. On earlier ocassions, I wrote half a page and it was deleted and could not be recovered. ( Sobs..)
Today just now I was watching a video on YouTube after reading an article on 'Gandhi' doing a striptease. While reading the article I thought that the video would be featuring original Gandhi who might have done those acts while his stay away from home.
But, the video
(
http://www.youtube.com/results?search_query=gandhi+%2B+pole+dance) featured a fake guy ( who was doubling for Gandhi).
First, my take on Gandhi and his philosophy. I personally do not endorse and subscribe to his philosophy ( by the way who cares, what I believe in or not, or for that matter what any other person believes). I do not like him to be called as 'Mahatma' and 'Father of Nation'. ( Will talk on this topic some time later in other post, not now).
I am a strong supporter of 'Right to freedom' and 'Right to express' but as they say I have a strong belief in "Your right ends where my nose starts." If one wanna have fun or enjoy or entertain oneself it should not be on expense of others, it should not hurt others. Though, having said that I also agree that it is impossible to please all so one person or the other may be hurt by your deeds but; your acts or deeds should have good intentions.
Now, coming again onto the video, I tried to be as neutral as possible but could not stop myself being outraged by the content of the video. The video was not done by good intention but to encash the cheap publicity. Furthermore, as I have already stated my takes and views, I became angry because the guy took advantage of a dead person (who happens to be very famous and is being worshipped by millions). The way it was being filmed was funny ( was it really????) but shameful act if you think that it is being done by an Indian and whatmore outside India.
Yes, I do not support Gandhi or his philosophy but I am patriotic in my own ways. Gandhi is a representative of India to the world. One can not and must not defame him in public or in front of the outsiders. It is just like the case that if you do not agree to your Father or Mother or any close relative you do not go to public to resolve the dispute. If you resent, you argue, you try to let them see your viewpoint not that you start abusing them in public. I was hurt because it hurt my sentiments of being an INDIAN.
Its high time we learnt to respect our Heroes, lest we become a shameless creatures of a shameless country.

जीवन नहीं मरा करता है

What can I say about the great poet and his poems... sppechless.. Again Gopal Das Neeraj...

जीवन नहीं मरा करता है
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों,
मोती व्यर्थ बहाने वालों,
कुछ सपनों के मर जाने से,
जीवन नहीं मरा करता है

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों,
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से,
सावन नहीं मरा करता है

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों,
फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से,
आँगन नहीं मरा करता है

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर,
केवल जिल्द बदलती पोथी,
जैसे रात उतार चाँदनी,
पहने सुबह धूप की धोती,
वस्त्र बदलकर आने वालों,
चाल बदलकर जाने वालों,
चँद खिलौनों के खोने से,
बचपन नहीं मरा करता है

Thursday, January 11, 2007

मिलन कहाँ पर होगा ?

Now I have become a fan of Gopal Das Neeraj... Hats off to his writing...

मैँ पीडा का राजकुँवर हूँ, तुम शहज़ादी रूपनगर की,
हो भी गया प्रेम हम मे तो बोलो , मिलन कहाँ पर होगा ?

मेरा कुर्ता सिला दुखोँ ने,
बदनामी ने काज निकाले
तुमने जो आँचल ओढे
उसमे अम्बर ने खुद जडे सितारे
मै केवल पानी ही पानी,
तुम केवल मदिरा ही मदिरा,
मिट भी गया भेद तन का तो, मन का हवन कहाँ पर होगा ?

मै जन्मा इसलिये कि,
थोडी उम्र आँसुओँ की बढ जाये,
तुम आयी इस हेतु कि मेँहदी,
रोज नये कँगन बनवाए,
तुम उदयाचल, मै अस्ताचल,
तुम सुखान्त की मै दुखान्त की
मिल भी गये अन्क अपने तो, रस अवतरण कहाँ पर होगा ?

मीलोँ जहाँ ना पता खुशी का,
मै उस आँगन का इकलौता,
तुम उस घर की कली जहाँ,
नित होँठ करे गीतोँ का न्यौता,
मेरी उमर अमावस काली
और तुम्हारी पूनम गोरी,
मिल भी गयी राशी अपनी तो, बोलो लगन कहाँ पर होगा ?

इतना दानी नहीँ समय की,
हर गमले मे फूल खिला दे,
इतनी भावुक नही ज़िन्दगी,
हर खत का उत्तर भिजवा दे,
मिलना अपना सरल नहीँ पर,
फिर भी ये सोचा करता हूँ,
जब ना आदमी प्यार करेगा, जाने भुवन कहाँ पर होगा ?

हो भी गया प्रेम हम मे तो बोलो , मिलन कहाँ पर होगा ?

पीर मेरी, प्यार बन जा !

Another touching poem by Gopal Das Neeraj....
Thnx to the orkut community tht I can re-read and relive those poems...

पीर मेरी, प्यार बन जा !

पीर मेरी, प्यार बन जा !
लुट गया सर्वस्व, जीवन,
है बना बस पाप- सा धन,
रे हृदय, मधु-कोष अक्षय,
अब अनल-अंगार बन जा !
पीर मेरी, प्यार बन जा !

अस्थि-पंजर से लिपट कर,
क्यों तड़पता आह भर भर,
चिरविधुर मेरे विकल उर,
जल अरे जल, छार बन जा !
पीर मेरी, प्यार बन जा !

क्यों जलाती व्यर्थ मुझको !
क्यों रुलाती व्यर्थ मुझको !
क्यों चलाती व्यर्थ मुझको !
री अमर मरु-प्यास,
मेरी मृत्यु ही साकार बन जा !
पीर मेरी, प्यार बन जा !

Wednesday, January 10, 2007

Karvan Gujar Gaya...(कारवाँ गुज़र गया )

Very Gud Poem By Gopal Das Neeraj..... Hope u'll like it and appreciate it..

कारवाँ गुज़र गया
स्वप्न झरे फूल से,मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके,मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे,वक्त से पिटेपिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।