Thursday, January 11, 2007

पीर मेरी, प्यार बन जा !

Another touching poem by Gopal Das Neeraj....
Thnx to the orkut community tht I can re-read and relive those poems...

पीर मेरी, प्यार बन जा !

पीर मेरी, प्यार बन जा !
लुट गया सर्वस्व, जीवन,
है बना बस पाप- सा धन,
रे हृदय, मधु-कोष अक्षय,
अब अनल-अंगार बन जा !
पीर मेरी, प्यार बन जा !

अस्थि-पंजर से लिपट कर,
क्यों तड़पता आह भर भर,
चिरविधुर मेरे विकल उर,
जल अरे जल, छार बन जा !
पीर मेरी, प्यार बन जा !

क्यों जलाती व्यर्थ मुझको !
क्यों रुलाती व्यर्थ मुझको !
क्यों चलाती व्यर्थ मुझको !
री अमर मरु-प्यास,
मेरी मृत्यु ही साकार बन जा !
पीर मेरी, प्यार बन जा !

No comments: